रविवार, 9 मार्च 2014

ग़ालिब -

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फर्क जब पूछता हूँ शायरों से "ग़ालिब का"
वो फरमाते हैं,ग़ालिब दुआ को कहते हैं

अंदाज़-ए-कलम,मैं(मयंक) नहीं जानता 
"ग़ालिब" शायद ख़ुदा को कहते हैं 
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ग़ालिब -

लोग कहते हैं कि "ग़ालिब"
अब नहीं इस दुनिया में 

फ़िर "में" वो कौन हूँ,जिससे 
हर रोज़ "ग़ालिब" मिलते हैं 

मेरी सियाही से,"ग़ालिब" के 
पन्नों कि खुशबू आती है 

मेरी कलम से,हर रोज़ 
"ग़ालिब" के फूल खिलते हैं 

"ग़ालिब" वो नशा हैं 
के शराब ज़रूरी नहीं 

महफ़िल में आज भी 
"ग़ालिब" नाम के जाम टकराते हैं 

कुछ रोज़ बाद,मैं भी आउंगा 
तुम्हारी दुनिया में "ग़ालिब" 

तमन्ना-ए-तालीम से 
कैसे कलम कि सियाही ख़त्म करते हैं 
कैसे कलम कि सियाही ख़त्म करते हैं !!
                        (मयंक बोकोलिया)