क्या कभी ऐसा होगा
होगा तो कब होगा
या होगा भी ……?
क्या कभी ऐसा होगा .......
वक़्त होगा भोर का
सुरज कि पहली किरण
बिजली कि तरह चमकेगी
सर सर सर आवाज करती
बहती हुई गंगा पर ……....
लहरें ले जा रही होंगी
हरे पत्ते कि कटोरी में पड़े
कुछ गुलाब के फूल
और एक जलते दिए को ……
सामने किनारे पर कुछ उतरती सीढियां होंगी
गंगा में !
सीढ़ियों पर खड़े होंगे
भगुए रंग में कुछ लोग
हाथों में अग्नि लिए
घुमा रहे होंगे
कुछ मन्त्र अपनी ज़ुबां से
गूंजा रहे होंगे ..........
वहीँ किनारे पर कोई
दिन भर कि थकान लिए सो रहा होगा
तो कोई बस एक डुबकी में
ज़िंदगी भर के पाप धो रहा होगा ………
वहीँ कहीं बहते पानी में अचानक
अपनी नाक डुबोए
निकल खड़ा होगा एक शख्स ,ऐसा भी
सर पर जिसके "गोल" छोटी सी टोपी होगी
चेहरे पर लम्बी-लम्बी दाढ़ी,बिना मूछ होगी
"जब मंदिरो में भी अल्लाह कि इबादत होगी"
क्या कभी ऐसा होगा ??????
होगा तो कब होगा
या होगा भी ....... ?
क्या कभी ऐसा होगा ……
हर तरफ भीड़ होगी
गले लग कर दुआ सलाम
चल रहा होगा ……
कोई अपनी पीठ झुकाये
नमाज़ में होगा
तो कोई चारो तरफ गर्दन घुमाये
इबादत में !
आस-पास बंधी होगी
काली-भूरी बकरिया
मीना बाज़ार कि दुकानो से
आ रही होगी महक इत्र कि
तो कहीं कोई बड़े से तवे पर
कट कट कट बजा,महका रहा होगा
कोरमे का धुआं .......
फिर वहीँ "जामा-मस्ज़िद" कि सीढ़ियों से
उतरता दिखे,एक ऐसा आदमी
सर पर जिसके बाल न हो
सिवाए एक चोटी के ……
पहनी हो जिसने
सलवटें पड़ी
एक सफ़ेद सी रंग कि धोती
छाती पर लटका हुआ हो
चार धागो में पिरोया हुआ
जनेऊ !
फिर एका-एक
"पुरानी दिल्ली" में बांग हो
हर हर महादेव कि जय ....
क्या कभी ऐसा होगा ?????
होगा तो कब होगा ?????
या होगा भी ????
क्या कभी ऐसा होगा …… ?
(मयंक बोकोलिआ)
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