शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

डूबा चाँद ...!

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बचे हुए बिस्कुट का चुरा
तारो से सजा दिया
कल रात जब मैं ,चाँद को
चाय में डुबो के खा गया .....
 
भीग के मेरी प्याली से वो
चाँद निकल कर आया जब
कुछ रूठा हुआ,कुछ उदास
फिर पल में वो पिघला गया........
 
कल रात जब मैं चाँद को
चाय में डुबो के खा गया... 

पाबंद वक़्त पर आता वो
इंतज़ार मेरा करता वो
वो चाँद मेरा दोस्त था
मेरे साथ साथ चलता था वो ......
 
फिर न जाने भोर पड़ी
वो चाँद भी घबरा गया
फिर धीरे धीरे आसमान में
छुप गया ,शरमा गया .....
 
कल रात जब मैं चाँद को
चाय में डुबो के खा गया .....
 
कुछ मेरी सी किस्मत थी उसकी
वो अकेला,मैं अकेला
कुछ दाग उसमे भी थे ,और
कुछ दाग से मैं था खेला ....
 
अँधेरे में खिल-खिल जाना
नूर अपना हर दिशा फेलाना
ठीक वक़्त पर आऊंगा मैं
कल तुम भी ठीक वक़्त पर आना ....
 
ये ख़ास बात,फिर वो मेरे
कान में बता गया !
कल रात जब मैं चाँद को
चाय में डुबो के खा गया ......!!
                       (मयंक बोकोलिआ)

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