बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

"न होता,तो ये होता ये होता,तो न होता"

"न होता,तो ये होता 
 ये होता,तो न होता" 

ये क्या के,सूख गए हैं दीये 
जो घी से गीले थे 
लगता है,उस मज़ार पर 
अब दुआ नहीं होती #1 

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न जाने क्यों,ज़रा सी बात पर 
आना-जाना बंद कर दिया 
निभाते जो दोस्ती 
तो बोतल अभी गीली होती #2 

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गर हिम्मत न करती 
खिल कर मुस्कुराने कि 
तो वो चमेली 
अब भी डाल पर होती #3 

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वो धुंध सुहानी लगती है 
जिसमे कुछ नज़र नहीं आता 
कल कि सब खबर होती 
तो ज़िंदगी कहाँ खूबसूरत होती #4 

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उसकी जेब "हरी" हो गयी
तभी तो आँखें "लाल" है 
घर के आँगन बड़े होते 
गर "ख्वाहिशें" कम होती #5 
                     
                     (मयंक बोकोलिआ) 

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