"न होता,तो ये होता
ये होता,तो न होता"
ये क्या के,सूख गए हैं दीये
जो घी से गीले थे
लगता है,उस मज़ार पर
अब दुआ नहीं होती #1
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न जाने क्यों,ज़रा सी बात पर
आना-जाना बंद कर दिया
निभाते जो दोस्ती
तो बोतल अभी गीली होती #2
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गर हिम्मत न करती
खिल कर मुस्कुराने कि
तो वो चमेली
अब भी डाल पर होती #3
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वो धुंध सुहानी लगती है
जिसमे कुछ नज़र नहीं आता
कल कि सब खबर होती
तो ज़िंदगी कहाँ खूबसूरत होती #4
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उसकी जेब "हरी" हो गयी
तभी तो आँखें "लाल" है
घर के आँगन बड़े होते
गर "ख्वाहिशें" कम होती #5
(मयंक बोकोलिआ)
बहुुत सुंदर. कविताएँ पसंद आईँ.
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